गुनहगार
ऑफिस आ के शर्मा जी ने अपना लंच बॉक्स अभी रखा ही था कि दरवाजे से वो उन्हें अंदर उनके केबिन की ओर ही आते दिखा।
शर्मा जी मन ही मन ही मन बुदबुदाए- सुबेरे सुबेरे चिरांद लग गयी आज फिर अब दिन खराब होगा।
मिश्रा जी खुद तो चले गए और ये हमारे भरोसे छोड़ गए।
रमेश अंदर आते ही हाथ जोड़ के खड़ा हो गया, कुछ बोला नहीं।
तब तक शर्मा जी के दो एक तलबगार भी केबिन में आ चुके थे पन्द्रह बीस मिनट के इन्तेजार के बाद रमेश बोला अंकल थोड़ा जल्दी में हूँ मेरा काम के लिए बस एक हस्ताक्षर ही करना है आपको।
1 महीने से चक्कर काट रहा हूँ आपके ऑफिस के, कोई और बात है तो बताइए मैं कुछ भी करूँगा सर्।
तमतमाया चेहरा उठा के शर्मा जी ने रमेश को देखा तो बेचारा रमेश फिर चुप रहा।
ऐसा है रमेश मिश्रा जी सिर्फ हमारी जिम्मेदारी नहीं थे, न तुम हो, सरकारी काम है यहां स्पीड से कुछ नहीं होता आयी बात समझ में की नहीं?
सर् मैं सब समझता हूं पर पापा बातों में अक्सर आपका नाम लेते थे कहते थे कि आप अच्छे इंसान हैं सबकी सहायता करते हैं इसलिए ही मैं आपसे से ही मिलता हूँ सर्, माथे पे आया पसीना पोंछते हुवे रमेश शर्मा जी के कठोर चेहरे को देखते हुवे बोला।
तो क्या करें ऐसे ही काम करते करते मर जाएं? हम भी इंसान हैं तुम उनकी जगह आओगे तो 4 पैसे मिलेंगे तुम्हेँ मुझे क्या मिलना है?
सर् आप बताइये तो सही मेरा काम हो जाएगा न मैं कुछ कर दूंगा आपके लिए भी।
उसके इस प्रतीक्षित जवाब को सुनते ही शर्मा जी नरम पड़ चुके थे धीरे से बोले शाम को कॉल करना।
रमेश अपना स्कूटर ले कर तुरंत घर जाने लगा घर पे मां भी तो है जिसने पिछले 10 दिन से न कुछ खाया न पिया बस मिश्रा जी के जाने के बाद सुध बुध खोये मां चुपचाप कोना पकड़ के रोती रहती है।
रमेश ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पिता की मृत्यु के बाद उसे अपने हक के लिए भी इतने पापड़ बेलने पड़ेंगे।
पीएफ का पैसा उनका फण्ड जो कि उसका वरिशान हक़ भी था उसी के लिए बाबू को 1 लाख रुपये दिए फिर भी सरकारी काम आगे नहीं बढ़ा।
मां की पेंशन का हक़ भी बहाल नहीं कर रहे ये लोग मेरी मृतक आश्रित नौकरी का तो क्या ही होगा?
खैर आज शर्मा जी ने उसमें एक नई उम्मीद जगाई है भले पैसे के सहारे ही सही पर काम तो होगा न।
ट्रिंग ट्रिंग फ़ोन की घंटी से शर्मा जी का ध्यान फ़ोन की ओर गया, हालो कौन बोल रहा है?
अंकल मैं रमेश वो पैसे का इंतजाम हो गया है मैं आपको मिलना चाह रहा हूँ। अंकल 50000 का इंतेजाम किया है जोड़ तोड़ के, आप काम आगे बढ़ाइए मुझपे भरोसा करिए मैं जरूर कुछ करवाऊंगा आपके लिए।
50000? शर्मा जी त्योरियां चढ़ा के बोले?
दूसरी ओर से आवाज आई जी अंकल।
क्या होता है 50000 रूपये से?
रमेश सकपका गया।
अंकल ये काम तो वैसे भी आपकी जिम्मेदारी है मैं चाहता हूं की जल्दी हो जाये इसके लिए मैंने बात की थी आपसे की कुछ ले दे के हो जाये।
शर्मा जी कुर्शी से लगभग उछल के गुस्से में बोले मेरे मैन में तुम्हारे पिता के लिए हमदर्दी है इसलिए मैंने कुछ ले दे के सब जल्द निपटाने का सोचा था।
पर अब तुम खुद देख लो मैं कोई मदद नहीं करूंगा अब काम काम की तरह होगा।
खटाक से फ़ोन पटक दिया गया था।
रमेश अब सहम चुका था उसे डर था कि अब उसका काम नहीं होगा।
3 बरस पहले तक सब कितना सही था पापा आफिस जाते थे तो लगता ही नहीं था कि कभी जिम्मेदारियां इस कदर उठानी पड़ेंगी की कंधों की मजबूती जो जिम जा जा के ओर प्रोटीन शेक पी के हासिल की थी मोमबत्ती की तरह पिघल पड़ेगी!
खून में कितना उबाल था उसके आये दिन किसी न किसी से झगड़ा लड़ाई मार पिटाई होती ही रहती थी।
गलत बात तो कभी किसी की बर्दास्त की ही नहीं मिश्रा जी ने घर पे बाबू ने इंक्रीमेंट नहीं लगाया ये बात उसके सामने बोली ही थी कि वो उठा और दो गली आगे रहने पंचोली जी जो मिश्रा जी के आफिस में बाबू थे उनके घर पहुँच के लड़ आया था।
शर्मा जी ने मिश्रा जी को जब बताया तो बस वो दम साध के सुनते भर रहे बोले कुछ नहीं।
घर आ के बस धम्म से बैठ गए थे वो और रमेश से बस इतना बोले थे कि मेरी मुश्किलें मत बढ़ा मैं वैसे ही उलझन में हूँ आजकल, अपनी समस्याओं से निपट सकता हूँ मैं तेरी इन हरकतों से नहीं निपट पाऊंगा।
अगर कुछ कर सकता है तो ढंग का काम काज ढूंढ के लग जा बस इतना ही काफी होगा मेरे लिए।
तुझे मालूम भी है कि लोग क्या क्या कहते हैं तेरे लिए गुस्से और किंकर्तव्यविमूढ़ लहजे में मिश्रा जी बोले जा रहे थे।
रमेश नें कभी किसी की गैर वाजिब बात नहीं मानी थी और आज वो अपनी सही चीज के लिए रिश्वत और पैसे देने तक के लिए तैयार था पर लोग काम तब भी नहीं कर रहे थे।
आज रमेश बिस्तर पे लेट के यही सब सोच रहा था और गहरे पश्चाताप में था कि काश पापा के ऑफिस के स्टाफ से संबंध मधुर होते तो शायद आज ये सारे काम आसानी से निपट गए होते।
दिमांग में कुँवे की गहराई से आती आवाज़ें उसकी पेशानी पे पड़ी खाल की सलवटें और गुस्सा जो शायद अब किसी को दिखाने का साहस वो कर नहीं पा रहा था।
उसे बस माँ की चिंता थी खुद की नहीं।
2 दिन बाद शर्मा जी स्कूटर से मिश्रा जी के घर के बाहर लगी भीड़ देख के ठिठक गए लोगों से पूछा कि क्या हुआ भाई?
अरे भैया क्या बताएं अभी मिश्रा जी गए थे और आज उनके बेटे नें पता नहीं क्या समस्या थी कि फांसी लगा के जान दे दी।
अब बेचारी उनकी धर्म पत्नी को कोई पानी पूछने वाला तक न रहा घर में।
शर्मा जी पसीने में नहा गए हाथ पांव ठंडे पड़ गए और चक्कर आने से गिरते गिरते बचे।
क..क...क.... क्यों कि आत्महत्या?
शर्मा जी ने प्रत्युत्तर में सवाल दागा तो सामने वाला कंधे उचकाते और झुंझलाते हुवे बोला क्या मालूम क्योंकि?
अरे खुद को परेशान क्यों कर रहे हो? बेकार लड़का था लड़ने झगड़ने में एक नंबर! शर्मा जी के अंतर्मन में सवाल चलने लगे थे।
और जवाब भी उन्हें अंतर्मन से ही मिल रहे थे।
कहीं कोई सुसाइड नोट तो नहीं लिख गया?
नहीं नहीं ऐसा नहीं किया होगा उसने मैंने तो मदद की थी उसकी कुछ पैसे ही तो मांगे थे उसके बदले और लोग तो उसकी मदद करने को भी तैयार न थे।
हाँ तुम ठीक थे शर्मा तुम ही ठीक थे बाकी सब गलत।
उसकी मानसिक स्थिति ही ठीक नहीं थी वर्ना कम से कम एक लाख तो उसने अरेंज किये ही होते भाई।
पचास हजार में क्या ही हिस्से आता तुम्हारे।
उधर अरे तकिये के नीचे से लेटर मिला है भाई कोई बाहर आ के बोला।
ओह फ... शर्मा जी अवचेतन से बाहर आये अंदर की ओर घबराहट में दौड़े।
पोलिस वाले पोस्टमार्टम के लिए पंचनामा भर रहे थे।
मिश्रा जी के लड़के ने आज भी मुठ्ठियाँ भींच रखी थीं कहीं से भी वो मृत नहीं लग रहा था।
एक कोने में मां भावहीन चेहरे के साथ बैठी थी उसे कुछ खबर न थी न दुख न सुख उसके चेहरे से कोई भाव दृष्टिगत न था।
खैर ये सब शर्मा जी नहीं वहां मौजूद और लोग देख रहे थे शर्मा जी का इंटरेस्ट था उस लेटर में जो पोलिस वाले पढ़ रहे थे आपस में खड़े हो के।
लेटर में लिखा था कि मेरी मृत्यु का जिम्मेदार कोई नहीं है, सबने मेरा हर तरह से सहयोग किया।
मैं अपने जीवन में निरुद्देश्य हूँ और ऐसा जीवन मुझे नहीं चाहिए।
मेरी माँ को मेरे पापा की पेंशन इत्यादि देदी जाए यही मेरी मरणोपरान्त एक मात्र इच्छा है ताकि वह आगे का जीवन सुगमता से जी सके।
शर्मा जी के मन से अब डर चला गया शर्मा जी वहां से निकले और घर आये बाहर लोटे में पानी मंगवाया हाथ मुंह साफ किये।
अंदर आ के पत्नी से बोले कि वो रमेश ने आत्महत्या कर ली।
पत्नी अवाक थी। क्यों?
अरे बिगडैल था शुरू से तुम तो जानती ही हो कोई आत्मग्लानि रही होगी वर्ना ऐसे कौन मरता है।
शायद नशेबाजी या लड़की बाजी का चक्कर पैसे थे नहीं कहाँ कोई साथ रहता है ऐसे।
हाँ शायद यही वजह होगी पत्नी शर्मा जी के जवाबों से संतुष्ट होते हुवे बोली तो शर्मा जी को किसी के क्यों के बदले अपने जवाब तर्कसंगत लगने लगे।
फ़ोन उठा के स्टाफ में बताया।
क्यों?
अरे बिगडैल था शुरू से तुम तो जानते ही हो, कोई आत्मग्लानि रही होगी वर्ना ऐसे कौन मरता है।
शायद नशेबाजी या लड़की बाजी का चक्कर पैसे थे नहीं कहाँ कोई साथ रहता है ऐसे।
हाँ शर्मा जी सही कह रहे हो।
आज अगर मिश्रा जी जीवित होते तो शर्मा जी शायद उन्हें भी ऐसी ही कॉल करते।
खैर शर्मा जी सवाल के जवाब कुछ इस तरह से तैयार कर चुके थे कि अपने दिल से बोझ उतार सकें या कम से कम कर सकें।
अगले दिन आफिस में आपस में लोग भी एक दूसरे के क्यों का जवाब-
अरे बिगडैल था शुरू से तुम तो जानते ही हो कोई आत्मग्लानि रही होगी वर्ना ऐसे कौन मरता है।
शायद नशेबाजी या लड़की बाजी का चक्कर पैसे थे नहीं कहाँ कोई साथ रहता है ऐसे।
आपस में यही ही दे रहे थे।
खैर शर्मा जी ने उसकी आत्महत्या की वजह अपने हिसाब से तलाश ली थी और रमेश की मानसिक स्थिति गड़बड़ बता के वह खुद का बोझ लगातार हल्का करने में जुटे थे।
पोलिस ने उसके लेटर का विवरण ऑफिस भेज दिया था शर्मा जी ने रमेश की मां की पेंशन बिना किसी लेन देन के बहाल कर दी थी।
शर्मा जी की पत्नी को गर्व था शर्मा जी के इस पुण्यकार्य पर।
सही भी तो है आजकल कौन बिना लिए दिए कुछ करता है।
लेखक: सुधांशु
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